Kalashtami vrat- करें भगवान भैरव को प्रसन्न और जाने इस व्रत की पूजन विधि, महत्त्व, मान्यता और कथा

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Kalashtami vrat vidhi katha- हर महीने के कृष्णा पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी होती है, इस दिन भगवान शिव के रूप कालभैरव के उपासक व्रत रखे जाते है। एक साल में कालाष्टमी के कुल 12 व्रत होते हैं। यहाँ हम कालाष्टमी के व्रत के सम्बन्ध में इस व्रत की पूजा विधि (Puja Vidhi), व्रत का महत्त्व (Vrat Mahatva), मान्यता तथा व्रत की कथा (Kalashtami vrat katha) के बारे में पढ़ेंगे। 

कालाष्टमी व्रत की पूजन विधि (Kalashtami vrat pujan vidhi)

Kalashtami vrat vidhi- वैसे तो हिन्दू धर्म में लगभग सभी व्रतों की पूजा दिन में या शाम को ही की जाती है लेकिन कालाष्टमी का एक व्रत ऐसा ही जिसमे भगवान को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा रात में की जाती है। इस दिन काल भैरव की पूजा करके उन्हें जल चढ़ाया जाता है। जैसा की हमने आपको अपनी पिछली पोस्ट में बताया था की काल भैरव भगवान शिव के ही अवतार है तो इसलिए इस दिन काल भैरव के साथ-साथ भगवान शिव और देवी पार्वती की भी पूजा हमे करनी चाहिए।

भगवान काल भैरव का वाहन कुत्ता होता है इसलिए हमे इस दिन कुत्ते को भी भोजन कराना चाहिए। काल भैरव की पूजा में काले तिल, धूप, दीप, गंध, उड़द आदि का इस्तमाल करना जरुरी होता है।

कालाष्टमी व्रत का महत्त्व (Kalashtami vrat ka Mahatva)

Kalashtami vrat mahatva– यह व्रत भगवान शिव के अवतार भगवान भैरव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। अगर कोई व्यक्ति इस व्रत को रखता है तो उसपे किसी भी तरह की नकारात्मक शक्ति का प्रभाव नहीं पड़ता है। इस दिन व्रत रखकर भगवान भैरव की आराधना करने से सारे कष्ट मिट जाते है, सफलता मिलती है और साथ ही साथ सभी तरह के रोगों से मुक्ति मिल जाती है।

कालाष्टमी व्रत की मान्यता (Kalashtami vrat ki Manyata)

Kalashtami vrat manyata– ऐसी मान्यता है की इस दिन भगवान भैरव की पूजा से भूत, पिशाच दूर रहते है, सभी कष्ट दूर होते है और रुके हुए कार्य बन जाते है। 

कालाष्टमी व्रत की कथा (Kalashtami vrat ki katha in hindi)

शिव पुराण में ये कथा कही गई है जिसके अनुसार,

Kalashtami vrat katha- देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णु जी से बारी-बारी पूछा कि ब्रह्मांड में सबसे श्रेष्ठ कौन है, जवाब में दोनों ने स्वयं को सर्व शक्तिमान और श्रेष्ठ बताया, जिसके बाद दोनों में युद्ध होने लगा। इससे घबराकर देवताओं ने वेदशास्त्रों से इसका जवाब मांगा। उन्‍होंने बताया कि जिनके भीतर पूरा जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है वह कोई और नहीं बल्कि भगवान शिव ही हैं।

ब्रह्मा जी यह मानने को तैयार नहीं थे और उन्होंने भगवान शिव के बारे में अपशब्द कह दिए, इससे वेद व्यथित हो गए। इसी बीच दिव्यज्योति के रूप में भगवान शिव प्रकट हो गए। ब्रह्मा जी आत्मप्रशंसा करते रहे और भगवान शिव को कह दिया कि तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो और ज्यादा रुदन करने के कारण मैंने तुम्हारा नाम ‘रुद्र’ रख दिया, तुम्हें तो मेरी सेवा करनी चाहिए।

इस पर भगवान शिव नाराज हो गए और क्रोध में उन्होंने भैरव को उत्पन्न किया। भगवान शंकर ने भैरव को आदेश दिया कि तुम ब्रह्मा पर शासन करो। यह बात सुनकर भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा के वही 5 वां सिर काट दिया, जो भगवान शिव को अपशब्ध कह रहा था।

इसके बाद भगवान शंकर ने भैरव को काशी जाने के लिए कहा और ब्रह्म हत्या से मुक्ति प्राप्त करने का रास्ता बताया। भगवान शंकर ने उन्हें काशी का कोतवाल बना दिया, आज भी काशी में भैरव कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं। विश्वनाथ के दर्शन से पहले इनका दर्शन होता है, अन्यथा विश्वनाथ का दर्शन अधूरा माना जाता है।


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